राहुल गांधी नरेंद्र मोदी अविश्वास प्रस्ताव

नैया को डगमगा न देने की चुनौती

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अविश्वास प्रस्ताव से पहले विरोधी खेमे में उत्साह की ऐसी बयार थी, कि मानो नरेंद्र मोदी और भाजपा का सफाया बस एक कदम दूरी पर है। सभी विरोधी दलों ने ऐसा माहौल बनाया था, कि सरकार के नाकों चने चबाने का समय आ गया। अपनी एकजुटता का स्वांग बनाने से लेकर बेसिर-पैर के आरोपों की झड़ी लगाने तक हर दल ने एक भीषण संघर्ष के लिए नगाड़े बजाने शुरू किए थे। लेकिन शुक्रवार को लोकसभा में जब अविश्वास प्रस्ताव आया और सभी नेताओं के भाषणों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जवाब देने के लिए उठे, तो यह सारा स्वांग फुर्र हो गया।

इस प्रस्ताव का नतीजा क्या होनेवाला है यह तो हर कोई जानता था, लेकिन जिस तरह वह धड़ाम से औंधे मुंह गिरा उसने सरकारी खेमे में नई ऊर्जा भरने का काम किया। छब्बे गए चौबे बनने, दुबे बनके वापस आए की कहावत को चरितार्थ करते हुए विरोधियों ने मोदी में विश्वास की गर्जना की थी और उनमें आत्मविश्वास भरकर लौट गए। जहां एक ओर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 126 मत पड़े वही सरकार के पक्ष में 325 मत पड़े, लगातार हुए उपचुनाव में जिस तरह से भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा था, उससे भाजपा के तेवर कुछ नर्म हुए थे। लेकिन बहुमत के इस विशाल अंतर ने उसे कठोर मुद्रा अख्तियार करने का मौका दे दिया। भाजपा नीत रालोआ के पास जितने सदस्य कागज पर है उससे कहीं ज्यादा मत उसे प्राप्त हुए।

भाजपा बुलेट ट्रेन में सवार करते हुए आगे निकल गई जबकि विपक्ष पैसेंजर गाड़ी में सिग्नल की राह देखता रहा। यूं भी कह सकते है कि विपक्षी एकता का बुलबुला बनने से पहले ही फूट गया। सरकार द्वारा विश्वास प्रस्ताव जीतने के बाद शेयर बाजार ने जिस तरह से उछाल ली उसे यही संदेशा लोगों तक गया, कि सरकार अभी भी अपने ट्रैक पर है।

यह बात सच है कि संसद की जिरह और चुनाव का रण इन दोनों में अंतर होता है। लेकिन संसद में सरकार को घेरकर चुनाव में मोदी को मात देने का विपक्ष का सपना आखिर सपना ही रह सकता है। इस दो दिवसीय चर्चा पर एक नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि मोदी को धूल चटाने के लिए विपक्ष को एक बड़े चमत्कार की जरूरत है। इसके लिए विपक्ष के पास अभी लगभग एक साल का समय है। मगर सोनिया गांधी से लेकर शरद पवार तक और राहुल गांधी से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक यह भूल नहीं सकते, कि जितना समय उनके पास है उतना ही समय नरेंद्र मोदी के भी पास है। अतः जो चमत्कार विपक्ष कराना चाहता है वही या उससे भी बड़ा चमत्कार नरेंद्र मोदी नामक जादूगर करवा सकता है।

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा बिल्कुल कोरी रही। विपक्ष की तरफ से गंभीर हमला करने में कोई भी सफल नहीं रहा। राहुल गांधी ने जोरदार कोशिश की, उन्होंने लड़ाई की मुद्रा भी अच्छी तरह अख्तियार की। ऐसा लगने लगा था, कि शायद विपक्षी बेंच पर बिताए हुए चार वर्षों ने उन्हें राजनीति के गुर सीखा दिए है। भाषण के अंत में नरेंद्र मोदी को उनके द्वारा गले लगाना भले ही राजनीतिक पैंतरे के रूप में उल्लेखित हो, लेकिन उसके बाद जिस तरह की आंख मिचोली उन्होंने की और पकड़े गए उससे उनका नौसिखियापन फिर से उजागर हुआ। अपने समर्थकों को निराश करने में राहुल गांधी ने बड़ी ही महारत हासिल की है।

सन 2012 से लेकर भारतीय राजनीति के लगभग सभी प्रमुख खिलाड़ियों ने नरेंद्र मोदी की वाक्पटुता से समझौता कर लिया है। आज की तारीख में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और जन सामान्य को संबोधित करने में जो विशेषज्ञता मोदी ने हासिल की है उसके आसपास भी कोई फटकता हुआ नहीं दिखता। उनके इसी कौशल का एक और नज़ारा लोकसभा में देखने को मिला।

विश्वास मत प्राप्त करनेवाले सरकार को विजय मिली और इस प्रस्ताव को लानेवालों को अपना कर्तव्य पूरा करने की संतुष्टि मिली। लेकिन सबसे ज्यादा फजीहत शिवसेना की हुई। शिवसेना की भूमिका क्या है यह आखिर तक कोई समझ नहीं पाया। भाजपा को समर्थन देने या उसका विरोध करने को लेकर पार्टी में असमंजस का माहौल रहा। नौबत यहां तक आई, की शिवसेना भाजपा को समर्थन दे रही है, उसका विरोध कर रही है या अनुपस्थित रहकर इज्जत बचा रही है इसकी सुध लेना भी लोगों ने छोड़ दिया। आगामी समय में इसका असर जरूर देखने को मिलने वाला है। बताया जाता है, कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र में अकेले के दम पर लड़ने के लिए कार्यकर्ताओं को आदेश दिए हैं। “मजबूर ये हालात इधर भी है उधर भी,” यह पंक्ति अगर किसी पर आज फिट बैठती है तो वह भाजपा और शिवसेना है।

बीजू पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल (बीजेडी) ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अविश्वास प्रस्ताव से किनारा कर लिया। कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने वाले बीजेडी ने अब तक खुद को कई तूफानों से अलग रखा है। और इस मैच में, जिसका नतीजा पहले एक्शन से ही तय था, किसी का भी पक्ष लेना पार्टी ने मुनासिब नहीं समझा जो उसकी समझदारी का परिचायक है।

राजनीति में एक और मजबूर पार्टी है तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक। लोकसभा में तीसरे नंबर के सदस्य जिस पार्टी के पास है उसकी भूमिका यूं तो महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन अन्नाद्रमुक आज नेतृत्व की कसौटी से गुजर रही है। उसका वजूद केंद्र की मोदी सरकार के रहमों करम पर कायम है। इसलिए उसका भाजपा के साथ जाना न किसी को खटक सकता है न आश्चर्यचकित कर सकता है। यह भी सही है, की अन्नाद्रमुक की घोर विरोधी द्रमुक कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए हुए हैं और इसलिए वह उस खेमे में नहीं जा सकती।
कुल मिलाकर भाजपा की नैया अनुकूल हवाओं के सहारे आगे बढ़ रही है। तृणमूल कांग्रेस, धर्मनिरपेक्ष जनता दल (जेडीएस) और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी चंद प्रादेशिक पार्टियों को छोड़ दे तो उसके सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं है। सपा और बसपा अभी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के फिराक में है। जिस तेलुगू देशम पार्टी ने यह प्रस्ताव लाया था उसकी और उसके नेता चंद्रबाबू नायडू की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के घेरे में रही है। कमोबेश वही हाल महाराष्ट्र में एनसीपी का है।
कांग्रेस पर तंज कसते हुए मोदी ने कहा था
“न मांझी न रहबर
न हक में हवाएं है,
कश्ती भी जर्जर
यह कैसा सफर है।”
मोदी के नेतृत्व में भाजपा की हालत बिल्कुल इसके विपरीत है। उसके सामने चुनौती है तो बस अपनी नैया को डगमगा न देने की।

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