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जज लोया मृत्यू – झूठों का मुंह काला

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न्या. लोया की मृत्यू के मामले में, जो अपने आप में साफ था, खुद उच्चतम न्यायालय ने सफाई दी है। अपना राजनीतिक अजेंडा चलाने के लिए जो लोग न्यायालय का उपयोग करना चाहते हैं उनके लिए इससे बड़ा तमाचा और नहीं हो सकता। न्या. बी. एच. लोया की मौत के के पीछे कोई भी गुत्थी नहीं थी और वह तू पूरी तरह से प्राकृतिक कारणों से हुई थी, यह न्यायालय ने बिना लाग लपेट के बता दिया।इतना ही नहीं इस पूरे मामले के पीछे कोई छुपा हुआ अजेंडा होने का का निरीक्षण भी दर्ज किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्या. खानविलकर और डी. वाई. चंद्रचूड की तीन सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला साफ शब्दों में सुनाया है। हालांकि इससे सूचना युद्ध के सैनिकों पर कोई असर होने की गुंजाईश नहीं है।
देश की सभी यंत्रणाओं को लेकर संदेह पैदा करना, गलतफहमियां फैलाना और षड़यंत्र सिद्धांत प्रसारित करने का उनका काम बेखटके चलता रहगा। इस वर्ष के जनवरी महीने में मुख्य न्यायधीश के विरोध में पत्रकार वार्ता कर संदेह का माहैल खड़ा करनेवालों को भी उन्होंने जबरदस्त जमाल गोटा पिलाया है।
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के वकील दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंग और प्रशांत भूषण को भी अच्छी खासी सुनाई है – सुस्पष्ट और निष्पक्ष! अर्थात् आधी रात के बाद न्यायालय के दरवाजे खोल कर साबित आतंकवादी को बचाने का नाट्य उसमें नहीं है, इसलिए उन्हें यह फैसला शायद रास ना आए। उस आशय की प्रतिक्रियाएं भी उनकी तरफ से आई है। संस्थात्मक औचित्य की (सिविलिटी) की साख न रखना और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विरोध में बेतरतीब आरोप करना, इसके लिए इन तीनों को न्यायालय ने खरी खोटी सुनाई है।
राजनैतिक, व्यक्तिगत और व्यापारी हित संबंधों के लिए जनहित याचिका (पीआइएल) का दुरुपयोग करने को लेकर भी पीठ ने उपदेश सुनाया है। इतना ही नहीं, सीधे-सीधे छूटे और पक्षपाती सामग्री प्रकाशित करनेवाले आंदोलनकारी माध्यमों पर भी न्यायालय ने कटाक्ष किया है। न्याय संस्था को कलंकित करने और न्यायतंत्र को गुमराह करने की यह कोशिश है, यह भी न्यायालय ने ही बता दिया है।
न्या. लोया का निधन दिसंबर 2014 में हार्ट अटैक के कारण हुआ था। नागपुर में अपने एक सहयोगी की बेटी की शादी के लिए कुछ सहयोगियों के साथ वे गए थे। सोहराबुद्दीन शेख के झूटे एन्काउंटर मामले की सुनवाई न्या. लोया के समक्ष चल रही थी।
इस मामले में एक आरोपी थे अमित शाह जो समय भाजपा के अध्यक्ष है। आज की घड़ी में नरेंद्र मोदी के बाद यदि कोई लिबरलों की आंख में खटकता है तो वह अमित शाह है!
निरंजन टकले नामक एक पेशेवर झूठी सामग्री लिखनेवाले पत्रकार ने उतनी ही बराबरी के कैरावान नामक पत्रिका में एक लेख प्रकाशित किया। न्या. लोया की मृत्यू संदेहजनक स्थिति में हुई। आरोपी को छुड़ाने के लिए उन्हें 100 करोड़ रुपयों की ओफर दी गई लेकिन उन्होंने उसे नकार दिया और इसलिए उनका अप्राकृतिक निधन हुआ, इस आशय की सामग्री उसमें थी। यह लेखन काफी हद तक सेमी फिक्शन के माफिक था। टकले की ख्याति ऐसी, कि उनके द्वारा प्रकाशित समाचार (जैसे सावरकर द्वारा माफी मांगना) और शेअर की हुई सामग्री (जैसे कल्पना इनामदार का गोपाल गोडसे की नातिन होना) झूठी साबित हुई है। इस पर प्रश्न पूछनेवाले को वे विकृत और पागल कह सकते हैं इतना लिबरल अधिकार उन्हें है।
कैरावान में प्रकाशित वह लेख वह सीधे-सीधे राजनैतिक अभिनिवेश से लिखा गया था। इसलिए भाजपा-विरोधी मीडिया ने उसे सिर-आंखों पर बिठाया। कांग्रेस पार्टी ने तो उसकी वकालत की ही, राहुल गांधी ने लोया की मृत्यू में भाजपा अध्यक्ष का हाथ होने का संकेत कई बार दिया। इस प्रकरण में उन्होंने पत्रकार वार्ता की थी और 150 सांसदो को साथ में लेकर वे राष्ट्रपति के पास भी पहुंचे थे।
अर्थात् इसमें इस प्रकरण में असल में ही कोई दम नहीं था इसलिए उस का प्रतिफल कुछ होने की संभावना भी नहीं थी। इंडियन एक्सप्रेस जैसे सीधे तौर पर सरकार विरोधी अखबार ने भी कैरावान के लेख को तार-तार कर दिया था। लेकिन न्यूज़ के नाम पर सोशल मीडिया पर ठिकरा फोड़नेवाले किसी भी कलमबाज़ ने इस सफेद झूठ को लेकर एक अक्षर भी नहीं निकाला। जो निकाला वह मोदी-शाह को तोप के मुंह में देने के लिए ही।

लेकिन इस मामले में शायद ऐसा कुछ हुआ जिसकी लिबरल गैंग के को उम्मीद नहीं थी। खुद न्यायाधीश और न्यायालय को ही मुलजिम के कटघरे में खड़ा करने के कारण उच्चतम न्यायालय ने तुरत-फुरत उसकी दखल ली और केवल तीन महीनों में इसकी सुनवाई पूरी की।
अर्थात् न्यायालय सत्य को उजागर करें यह लिबरलों का उद्देश था ही नहीं। जहां आग है वह धुआं है, यह आम मनुष्य की प्रवृत्ति है। इसलिए चाहे जिस तरह से हो इन्हें धुआं खड़ा करना है ताकि आग-आग के ललकारें वे लगा सकें। शायद ऐसा निर्णय आने का उन्हें अंदेशा था इसीलिए जनवरी महीने में न्याय तंत्र के ही कुछ लोगों ने विद्रोह का दृश्य मंचित किया था। अब दूध और पानी अलग होने के बावजूद दूध में पानी होने का संदेह कायम रहेगा।
न्यायाधीश पर ही गुर्रानेवाले वरिष्ठ वकील, सुपारी लेकर सामग्री प्रकाशित और प्रसारित करनेवाली मीडिया और पूरी तरह परावलंबी बुद्धि के गैर-जिम्मेदाराना राजनेताओं से न्यायतंत्र और देश को बचाने की जरूरत है।
लिबरलों का पसंदीदा वाक्य प्रयोग करें तो – “पहले कभी नहीं इतनी जरूरत है”!

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