rajya sabha deputy chairman election

यह कैसा है एका, जहां हर कोई अकेला

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मुट्ठियां भींचते हुए और भौहें तनते हुए कांग्रेस तथा उसकी मिली जुली पार्टियों ने जिस विरोधी एकता की ललकार की थी, वह एक झटके में तार तार हो गई। और यह सब 3 महीने के भीतर! तथाकथित महागठबंधन का वजूद बनने से पहले ही बिखर गया! राज्यसभा में बहुमत होने के बावजूद विपक्षी दल उप सभापति पद के लिए अपने उम्मीदवार को जीता नहीं सके और वहीं यह भाजपा नीत एनडीए ने अपने झंडे गाड़ दिए। इससे विपक्षी एकता का जो शगूफा कुछ लोगों ने थोड़ा है वह खोखला है, इसका नजारा भी लोगों को हो गया।

इस चुनाव में संयुक्त जनता दल के हरिवंश नारायण सिंह को 125 और बी. के. हरिप्रसाद को 105 मत मिले। लोकसभा चुनाव में एक वर्ष से भी कम समय रहने के चलते यह चुनाव राजग और संप्रग दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

भाजपा ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए अपने सहयोगी हरिवंश को राज्यसभा उप सभापति पद के लिए मनोनीत किया। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के हरिप्रसाद को बड़े अंतर से हराया। हरिप्रसाद की राजनीतिक साख का अंदाजा इस बात से किया जा सकता है, कि पिछले 40 वर्षों के अपने राजनीतिक कैरियर में उन्होंने आज तक कोई चुनाव नहीं जीता है। कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाकर अपनी फजीहत खुद की है। वैसे भी, राहुल गांधी के उदय के बाद पार्टी इसकी आदी हो चुकी है। खैर, अपना स्वतंत्र उम्मीदवार खड़ा करना देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए राजनीतिक चाल के रूप में समर्थनीय माना जा सकता है। लेकिन उस उम्मीदवार के लिए अन्य दलों से समर्थन मांगना किसके शान के खिलाफ था?

इस चुनाव में ऐसा भी मज़ेदार नजारा देखने को मिला कि कांग्रेस को नेस्तनाबूत करते हुए दिल्ली की सत्ता हथियानेवाली आम आदमी पार्टी उसको समर्थन देने के लिए मचल रही थी और कांग्रेस उससे किनारा करने की जद्दोजहद कर रही थी। इसी तरह सरकार का विरोध करनेवाली किसी भी पार्टी से तालमेल बिठाना कांग्रेसियों ने जरूरी नहीं समझा। महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी भाजपा को परास्त करने के लिए लालायित थी। लेकिन उसका समर्थन पाने के लिए भी कांग्रेस की ओर से कोई कोशिश नहीं की गई।

भाजपा की रणनीति

इसकी तुलना में, एनडीए नेतृत्व ने लगातार क्षेत्रीय दलों से संपर्क बनाए रखा। बीजू जनता दल जैसे जो क्षेत्रीय दल, जो एनडीए में नहीं है लेकिन जो घोर कांग्रेस विरोधी है, उन्हें पटाने में एनडीए नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। विजयी और पराजित उम्मीदवार के मतों में केवल बीस का अंतर देखते हुए बीजेडी के 9 मत कितने अहम होंगे, इसका अंदाजा किया जा सकता है।

इसका नतीजा जो होनेवाला था वह हुआ। जेडीयू के उम्मीदवार ने भारी विजय प्राप्त की और अब इसके लिए कांग्रेस किसी और को दोष नहीं दे सकती।

भाजपा ने अपना उम्मीदवार खड़ा ना करते हुए एक तीर से दो निशाने लगाए। एक तरफ तो जेडीयू के खफा होने की खबरों को उसने पूर्ण विराम दिया, वहीं गैर भाजपा दलों को सिंह के खाते में वोट डालने के लिए प्रेरित भी किया। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति को देखिए। तेलंगाना के इस सत्ताधारी दल ने कुछ ही महीने पहले तीसरे मोर्चे का आगाज किया था। टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव भाजपा विरोधी महागठबंधन की धुरी बनकर उभरे थे। लेकिन उसी टीआरएस ने अपना मत जेडीयू के पाले में डाल दिया। आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस ने ना भाजपा को वोट दिया ना कांग्रेस को, बल्कि अनुपस्थित रहकर एनडीए की मदद की। हां, तेलुगू देशम पार्टी ने जरूर कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस और टीडीपी में 2019 में गठबंधन होगा। कारण यह, की आंध्र में टीडीपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस है और आंध्र में कांग्रेस का संघटनात्मक आधार बहुत ही कम है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के अव्यवस्थित विभाजन को लेकर वहां के लोग कांग्रेस और यूपीए से अभी भी नाराज है। इसलिए उसके साथ रहना कोई नहीं चाहेगा। तमिलनाडु की सत्ताधारी अन्नाद्रमुक ने भी सरकार के साथ रहना पसंद किया। तमिलनाडु के वर्तमान नेतृत्वहीन परिदृश्य में वहां की पार्टी मोदी जैसे सशक्त नेता से दूरी कभी नहीं बनाएगी।

अकाली दल और शिवसेना जैसे नाराज चलनेवाले दलों से दिलमिलाई करने के लिए भी भाजपा ने इस मौके का फायदा उठाया। यानि वर्तमान दोस्तों को कायम रखते हुए वह नए दोस्तों की खरीदारी करती रही।

कुल मिलाकर कांग्रेस के पास तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, डीएमके, पीडीपी और वामपंथियों के वोट रहे। क्या यह सारे दल अगले चुनाव में कांग्रेस के साथ खड़े रहेंगे? क्या राहुल गांधी का नेतृत्व उन्हें रास आएगा? इस चुनाव ने दिखा दिया, कि अधिकांश क्षेत्रीय दल अवसरवादी है और जिस दिल के पास सत्ता स्थापना के अवसर अधिक है उसके साथ जाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। जिस तीसरे मोर्चे की डिंगे यह दल हांक रहे थे, और कांग्रेस उनके सुर में सुर मिला रही थी, वह बस दूर की कौड़ी है।

यहां कोई एका नहीं है बल्कि यहां हर कोई अकेला है।

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